चार लोग तो चाहिये, अकसर इस जरूरत का अहसास करवा ही दिया जाता है जीवन यात्रा के उद्भव से, इस चेतना में चलते चलते आपकी पहुँच आपकी पहचान बनती चली जाती है।
चार, चार हज़ार चार लाख या चार करोड़।
यह पहुँच केवल मात्रा मात्र है या उसके आगे भी कुछ,
भीड़ के बीच अकेला, कुँए का मेंढक , स्पर्श विहीन,
पहुच से लाभ पाने की असीमित लालसा,
स्वयं के लिए नहीं तो परिवार के लिए नहीं तो मित्र के लिए ।
अंत अकस्मात् होता है पर तैयारी जीवन भर ।
समाज के साथ भी और साथ ही सेंध लगाते अस्तित्व । दोगला जीवन। सामाजिक सहमति प्राप्त यह व्यवस्था जैसे श्रष्टि का संवाद बन गई है, कोई अंगुली नहीं उड़्ती।
पहुच के बल पर रतन टाटा ने सरकारी नियम का संशोधन जो केवल टाटा समूह के लिए ही मान्य है , करवाया क्योंकि उन्हें लगता था कि इस नियम से समूह के अस्तित्व को खतरा हो सकता था ( कंपनी एक्ट सेक्शन 153A , किसी ट्रस्ट को सीधा किसी कंपनी की बोर्ड बैठक में मत देने का अधिकार नहीं ) अब यह कहना मुश्किल है कि उन्होंने अपना कंधा दिया, ख्याति पाई या वाकई पूँजीवादी विचारधारा से प्रभावित रहे।
ऊपर चित्र में जिमी टाटा, रतन टाटा के छोटे भाई, जो अव्यावसायिक रहे, भीड़ में एक नजर आये भाई की अर्थी और अंतिम विदाई के समय। दो जीवन दो भाई कितनी विषमता?
जेआरडी टाटा की मृत्यु के बाद रतन टाटा पर समूह का भार लाधा गया । समूह , MRTP act (1969) के लागू होने से विघटन के द्वार पर था । 2002 में दूसरी सरकार बनी और पहुच काम कर गई, नियम संशोधन कामगर सिद्ध हुआ। रटंत टाटा ने नये AOA बना ट्रस्ट की पकड़ ओर मज़बूत की।
2023-24 टाटा समूह की कुल आय $165b से अधिक थी। रतन टाटा का उतराधिकारी वंश के बाहर से, सवाल ही नहीं । उससे आगे सोचने की क्षमता शायद रही ही नहीं ।
न चर्चा रही दो भाइयों के साथ रहने की , न चर्चा रही जीवनसंगिनी के न बन पाने की।
पहुँच और साथ की दवंदता में
सुंदर साथ की अनिवार्यता शूर्ण होना एक श्राप है।
जीवन का परियोजन अर्थी का साथ बनाने की चेष्टा से कही उपर स्पर्श के अहसास से तरंगित जैसे एक नृत्य की संरचना में बनने वाले सुंदर साथ का रहता जिसमे सुर ताल का ऐसा सामंजस्य हो जिसके आनंद लाभ के सामने ओर सब फ़ीका लगे, उस अवस्था को विरले पाते हैं, अधिकतर अपने नृत्य की संरचना माया की पहुँच से ही कर पाते है, सजीव और निर्जीव, पक्ष और विपक्ष ।
पहुँच का नशा सर चढ़कर बोल रहा है , जैसे पहुँच के बाहर कुछ है ही नहीं ।
जितना बड़ा शहर उतना घना।
छोटे गाँव और क़स्बों में पहुँच की व्यवस्था कुछ भिन्न है।
शहरों में फ़लाँ डॉक्टर, फ़लाँ कॉरपोरेटर, फ़लाँ इन्सपेक्टर आदि की पहुँच की मान्यता है पर सत्ता से दूर दराज के इलाक़ों में डेरों और बाबा लोग कड़ी बन जाते हैं।
बाबा राम रहीम न्याय प्रक्रिया का ऐसा अनूठा खेल दिखाते हैं जैसे जेल और पैरोल एक दूसरे के पूरक हों, साल में 25 30 पैरोल, ठीक चुनाव के पहेले जेल से पैरोल पर बाहर आ कर अपने अनुयायियों को निर्देश देते हैं की एक पार्टी विशेष के पक्ष में वोट दें। सत्ता की भूल भुलैया में एक शासन से मान्यता प्राप्त उपमार्ग, शायद दोनों पक्ष लाभार्थी होंगे, नीचे से सीधे उपर, उपर से नीचे। सब अप्रोक्ष।
पहुँच का एक नया प्रावधान पिछले कुछ समय से सामने आया है
सरकारी कर माफ़ी, कन्या बेटी को धन का सीधा वितरण, बिजली पानी बिल माफ़ी….टोल माफ़ी ।
सत्ता पक्ष की पहुँच का परोक्ष प्रयास। सब कुछ जायज़ ।
हर कर्म परिक्रम से जुड़ा रहता है । काश यह सत्य चिन्हित रहता हमेशा हर समय हर एक के मस्तिकपटल पर।
पहुँच का ख़्याल या उससे जुड़ा कर्म वस्तुतः एक ऐसी शृंघला को जन्म देता है जो समग्रतां में समाज को खोखला करती जाती है। सत्ता अपना हित पहले की बीमारी से ग्रसित जीवों की बपौती हो कर रह जाती है। शरीर और साधनो तक सीमित यह तबका नश्वर दलदल में उलझ ज्ञान की परिभाषा भूला चुका है।
अर्थी का साथ एक सार्थक नीति नहीं है जिसके लिए प्रयासरत रहने की अवश्कता है ।
मानव की क्षमता सहयोग कौशल के विकास से उद्रित हुई है, नागरिकों के नियम बने, टेक्नोलॉजी से इन्हे और विकसित कर सर्वसहमति से सामूहिक विषयवस्तु विगास का ध्येय ही नश्वरता के दलदल से निकाल मानवता को पुनः धरातल पर ला सकता है।
सुन्दर साथ हो तो मंज़िलों की कमी तो नही,
पर आनंद निकटता का है, बिना छल, स्वच्छंदता से लबालब, निजता सम्मिलित, समायोजन से भरपूर,
जिसका विपक्ष है ही नहीं।
Chappals of Kolhapur are forgotten in the song ...........? No PRADA have found it in their new arsenal despite the miss. Local Crafts and craftsmanship is finding foot with one of costliest brand of lifestyle. Social responsibility of a corporate waking up to make a INR150 worth of good today to be available in future at a tag of INR15000. Of course there would be strings attached. Exclusivity..... Per force new association euphoria is likely to transcend Chappals to a new horizon. Common man would be pushed to synthetic wears; average craftsman would not find a buyer; middleman wallet swell. We saw it happening with custom tailoring, local shoe makers, atta chakki and many more in past. History is set to repeat. PRADA KOLHAPUR SYMPHONY is orchestrated. Enjoy$$$.