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Showing posts from October, 2024

Arthi Ka Saath (Last Rights)

चार लोग तो चाहिये, अकसर इस जरूरत का अहसास करवा ही दिया जाता है जीवन यात्रा के उद्भव से, इस चेतना में चलते चलते आपकी पहुँच आपकी पहचान बनती चली जाती है। चार, चार हज़ार चार लाख या चार करोड़। यह पहुँच केवल मात्रा मात्र है या उसके आगे भी कुछ, भीड़ के बीच अकेला, कुँए का मेंढक , स्पर्श विहीन, पहुच से लाभ पाने की असीमित लालसा, स्वयं के लिए नहीं तो परिवार के लिए नहीं तो मित्र के लिए । अंत अकस्मात् होता है पर तैयारी जीवन भर । समाज के साथ भी और साथ ही सेंध लगाते अस्तित्व । दोगला जीवन। सामाजिक सहमति प्राप्त यह व्यवस्था जैसे श्रष्टि का संवाद बन गई है, कोई अंगुली नहीं उड़्ती। पहुच के बल पर रतन टाटा ने सरकारी नियम का संशोधन जो केवल टाटा समूह के लिए ही मान्य है , करवाया क्योंकि उन्हें लगता था कि इस नियम से समूह के अस्तित्व को खतरा हो सकता था ( कंपनी एक्ट सेक्शन 153A , किसी ट्रस्ट को सीधा किसी कंपनी की बोर्ड बैठक में मत देने का अधिकार नहीं ) अब यह कहना मुश्किल है कि उन्होंने अपना कंधा दिया, ख्याति पाई या वाकई पूँजीवादी विचारधारा से प्रभावित रहे। ऊपर चित्र में जिमी टाटा, रतन टाटा के छोटे भाई, जो ...