रिश्ते स्वाभाविक हैं या अपनाए जाते हैं चिरकाल से हम इसी असमंजस में रहे हैं । यदि स्वाभाविक होते तो समाज संगठित करने की आवश्यकता ही क्या रही होगी, क्या मनुष्य अकेला नहीं रह सकता, कहा जाता है, किसी ज़माने में ये रहा होगा परंतु अब तो तकनीकीकरण ने इतना विवश कर दिया है कि समाज में मिलकर चलना एक दुविधा सी लगने लगी है, क्या यह सही है ?
66 साल की एक विधवा इतनी विवश हुई कि जब वह रात सो नहीं पाई, उसने अपने मनोचिकित्सक को phone कर रात दो बजे अपनी व्यथा सुनाई,”मेरे बच्चे कहते हैं मैं इससे बाहर निकल पाऊँगी, उनके पिता का जाना, समय मुझे उनके सानिध्य को भूला देगा, मुझे कुछ कोशिश करनी चाहिए, क्या होगा अगर मैं यह न कर पाई”। मनोचिकित्सक ने क़रीब 45 minute तक उस अकेली के साथ बात करते हुए उसके बीते हुए समय की याद जो वह भुला नहीं पा रही थी, साझा की। उस महिला की मनोदशा इससे कुछ सुधरी। यहाँ क्या यह समझा जाय कि पति से रिश्ता उसके लिए बोझ है, अगर वह बंधनमुक्त होती या रिश्ते की साझेदारी इतनी भी मीठी न रहती कि उसका बिखरना असहनीय हो जाए, एक परिपक्व विश्लेषण नहीं होगा। विरोधाभास है अगर तो स्त्री पुरुष की बदलती हुई सीमारेखाओ का और समाज की संरचना जो समय से बदलती नहीं।
ऐसा नहीं है कि मैं एक खुले समाज की भूमिका बाँध रहा हूँ पर इतना अवश्य कहूंगा कि भाषा जिसमें human का अर्थ मनुष्य या मानव तक ही सीमित हो, अब सभी को मान्य नहीं। स्त्री और पुरुष प्रजाति नहीं। आवश्यकता है, एक विस्तृत शब्द की जो दोनों के आत्मिक पर्यवेक्ष को ओर निखार सके, उन सम्भावनाओं का विस्तार कर सके जिस से एक से भेले दो वास्तव् में सत्य हो।
ब्रह्म से बिछुड, ठिठक कर स्वयं में लीन ऐकान्तिक अवस्था निश्चय ही असह है यदि अनंत तक विस्तृति लगे। डिजिटल संचरण में विलोपी स्वतः इस क़ैद से विषिप्त हो जाते हैं।
रिश्ते, शब्द की धरोहर हैं, शब्द से विस्मादित है ब्रह्म। शब्द की दस्तक को पहचान पाना ही रिश्तों का आधार है। यह ० और १ के बीच सीमित नहीं, यह डिजिटल अल्कोहलिक की समझ से परे है। इस दायरे में फँसे या उभरे रिश्ते मीठे होंगे या नहीं, चिरस्थायी होंगे या खोजते हुए अकेलेपन का शिकार कर देंगे, इस प्रश्न का उत्तर गत मात्र ५ -६ वर्षों में मिलने लगा है। क्षणों में प्राप्त तृप्ति से मानस उस ऊँचाई पर चला जाता है जिस में सर्वदा रहने
की लालसा प्रबल रहती है , लत पड़ती है और dopamin rush की समस्या एक विकराल रूप लेती है। कहा भी जाता है कुकरमुत्ता एक रात में जन्म लेता है पर बरगद बढ़ने में कई वर्ष, सदियाँ बर्दाश्त करने की नियति से प्रेरित रहता है।
रिश्ता भावना को शून्य, या शून्य और एक बीच से आगे ले जा कर जीवन के ख़ालीपन को इस तरह भरता है की उस परिवेशगत ब्रह्मांड की विवेचना या विश्व व्याप्ति विष्माद की ऊर्जा का विस्तार होता है, जिससे सामाजिक भावनाऐ उभरती है, मौलिक आनंद की अनुभूति एवं आत्मसम्मान शंका मुक्त होता है।
रिश्तों के विस्तार में लोकनीति का दायित्व तो है ही पर हमेशा ख़ुद को एक वृहद अभिकल्प का हिस्सा जानना भी आवश्यक है। अपनी उत्पत्ति को एक उद्देश मानना अच्छा है पर इस भ्रम से दूर रहना भी कि आप ही किसी उपक्रम की धुरी हैं। नियति ही सांसारिक सम्बन्धों का आधार है यह मान कर आँखें मूँद लेना, तर्क नहीं केवल अपने विवेक को ताक पर रखने जैसा है। आपने कहते सुना होगा खून पानी हो गया, विवेक के अभाव को ही दृष्टाता है।
अविरत हृदय स्पंदन शब्द के एक एहसास की प्रथम सीढ़ी है। रिश्तों के अगास और विस्तार का मूलमंत्र, एकमात्र आवश्यकता। सहज, भय और भरम से मुक्त ।
इतना ही सरल और मधुर ।
हृदय गोपनीय है एक विस्तार में, रिश्तों की महत्वाकांक्षा भी इतनी ही है। अतिव्याप्त नहीं, निरस्त नहीं । केवल सहकार की मर्यादा की अपेक्षा। 22 साल का हरिकिसन जो कभी जीवित यक्ष की माने जी रहा था, इस डर में की रिश्तों का बिखरना अवश्मभावी है, दूर रहता । उसने इसका उपचार भी स्वयं ढूँढ लिया, अपने जैसों को इकट्ठा कर जो उसकी तरह मशक़्क़त कर रहे थे। उसने अब एक फुटबॉल क्लब बनाया, खेल जिसमे सबकी दिलचस्पी है। इस बंधन को सुदृढ़ करते वे मिलकर मूवी जाते हैं, पिकनिक मनाते हैं अक्सर अवसर बना के । आशा ईसी तरह तरंगित करती है, इल्ली से तितली बनते उदाहरणों से जो रिश्तों को स्वाभाविक बना खुद भी जानदार, damdar और खुशाल रहते हैं।
Chappals of Kolhapur are forgotten in the song ...........? No PRADA have found it in their new arsenal despite the miss. Local Crafts and craftsmanship is finding foot with one of costliest brand of lifestyle. Social responsibility of a corporate waking up to make a INR150 worth of good today to be available in future at a tag of INR15000. Of course there would be strings attached. Exclusivity..... Per force new association euphoria is likely to transcend Chappals to a new horizon. Common man would be pushed to synthetic wears; average craftsman would not find a buyer; middleman wallet swell. We saw it happening with custom tailoring, local shoe makers, atta chakki and many more in past. History is set to repeat. PRADA KOLHAPUR SYMPHONY is orchestrated. Enjoy$$$.